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Archive for अप्रैल, 2010

वाकई जो इश्क होता!


इन चाहतों पे दिल का,अगर इख़्तियार होता,
न   ये  बेकरारी   होती,  न  इन्तिज़ार  होता.

गिरेबान   कह   रहा  है,  दीवानगी   नहीं   है,
वाकई  जो  इश्क  होता,  ये  तार  तार  होता.

तेरी बेरुखी ने सब कुछ, कह दिया था, सच है,
पर होश ही कहाँ था,  जो  मैं  होशियार होता.

दोस्तों   की   उसको,  कमी  कभी  नहीं  थी,
ख्वाहिश यही  रही की,  कोई  राजदार होता.

मछली  की आंख  हम  भी, तो बेंध दिए होते,
महबूब के हाथो में जो,
स्वयंवर
का हार होता,

‘राजीव’  भी   लगता   है,  बेकार  घूमता  है,
ग़ज़लें  कहाँ  वो कहता,  अगर रोज़गार होता.

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