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आज तेरे शहर में..


भीड़  में  तनहा  खड़ा हूँ, आज  तेरे शहर में,
हर कोई  नामेहरबाँ  है  आज  तेरे  शहर में.

कल तलक तो इक खुला मजमून था तेरा शहर,
आज हर  इक  बात में  हैं राज़  तेरे शहर में.

हार कर भी जीत न पाया मैं बाज़ी प्यार की,
मैं  शिकस्ता-पा खड़ा हूँ,  आज तेरे शहर में.

भूख से रोते तड़पते, सिसकते बच्चों को देख,
हर मर्ज़  का है  कहाँ   इलाज़  तेरे शहर  में.

क्या हुआ तेरा हमेशा हसने हंसाने  का फन,
लोग क्यूँ मायूस हैं,
फिर आज
तेरे शहर  में.

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